कल रात फिर आँखों में ही निकल गई,
नींद भी जैसे मुझसे रूठ गई।
अगर तुझसे पूछूं ऐ खुदा,
ये प्यार मुझे ही क्यों न मिला,
तो तू मुस्कुरा कर कह देगा—
"जो इतना दिया, तब क्यों न पूछा,
सब मुझे ही क्यों मिला?"
पर यूँ सुकून से प्यार में सोना,
एक दूजे में पूरी तरह खोना,
ये एहसास मुझे क्यों न मिला?
जाने क्या कमी रह गई मुझ में,
कि हर कोशिश अधूरी सी रह गई।
खुद में ही नुक्स निकाल लिए,
हर ख्वाब से दूर निकल लिए।
सारी कोशिशें आज़मा ली थीं,
फिर भी राहें तन्हा सी रह गईं।
अब कहाँ से फिर शुरू करूं,
किस मोड़ से फिर जुड़ूं मैं?
क्या अब भी कहीं बाकी है,
रिश्तों को खूबसूरत बनाने की
कोई छोटी सी गुंजाइश?
फिर भी जो भी दिया क्या खूब दिया,
शुकराना उसका..


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