ये जंहा हम हार मान जाते हैं,
या पत्थर-पत्थर को भगवान मानते हैं, जंहा पहचान होती है अपनो की, दुरी से या हो नज़दीकियों से, जंहा शौहरत ऐसो -आराम, उसकी अकद, वो गुरुर, दूसरो को नीचा दिखाना, ख़ुद पे गुरूर, सब ताश के महल की तरह, दह जाता है, यन्हा सभी आते हैं, जो दिल के अच्छा, थोड़े मन के saccha,, मक्कार, या कपटी, जब देखता है asliyat,नवाते है sir,
इक इंसान के आगे,
जब क्या ना मिला,
की जगह जो है,
उसका शुक्रिया मानता है,
कोई या नहीं,
ये है अस्पताल,
जो सबके लिए एक सा है,
तो क्यों ना थोड़ा आज में मुस्कुरा ले,
जो भी मिले उसे मना ले,
एक दूजे को विश्वास दे,
हिम्मत तोड़े ना किसी,
खुद हिम्मत बन जाये सबकी!
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