Thursday, 2 April 2026

MADHAV



माधव, बस तुम थे,

जब भी सबने साथ छोड़ा,

जब मैंने अपने ही निर्णयों को कोसा,

तुम थे।


यूँ वक्त उल्टा चल पड़ा था,

बिन पाप के प्रायश्चित सा जीवन हो चुका था,

मैंने जब भी किसी से आस लगाई,

यूँ ही मेरी आँखें डबडबाई,

पर तुमने उन बिलखती रातों में थाम लिया,

अपने आलिंगन में ले, प्रेम बन मेरा सारा दर्द ढाँप लिया।


मुझे इस जीवन और जीवों पर शंका होने लगी,

सब झूठ है — ऐसा मन कहने लगा,

तुमने सखा बन फिर से जीवन को थाम लिया।


जब भी हिम्मत टूटी,

भावनाएँ और मेहनत

ताश के पत्तों सी बिखर कर छूटी,

तुमने गुरु बन

फिर से सब संभाल लिया।


माधव,

मेरे प्रेम, सखा और मार्गदर्शक,

बस तुम हाथ थामे रखना,

यूँ ही रातों में मुस्कुराते रहना।


कभी मेरा प्रेम बन जाना,

वो प्यारा सखा बन जाना,

तो कभी कौरवों सी दुनिया से

मुझे बचाने वाले संरक्षक बन जाना।


तुम ही कृष्ण हो,

तुम सदा थे जब सब छोड़ गए,

तुम ही थामे रखते हो मेरा हाथ,

राधा सा प्रेम देते हो,

रुक्मिणी सा सम्मान,

और द्रौपदी सा अटूट सखा बन साथ निभाते हो।


तुम प्रेम हो,

तुम प्रीत हो,

हर उस बुरे वक्त को पलटने वाले सारथी हो।


बस मेरे संग रहना प्रभु...

कृष्ण... मेरे माधव...


ये नयन,

तुम्हारे नयनों में खोकर

सारा संसार पा लेते हैं।


और अब,

जब भी मन डगमगाता है,

तुम्हारी वंशी की धुन

अंतरतम में गूंज जाती है।


जब अंधकार घना छा जाता है,

तुम दीप बन राह दिखाते हो,

जब शब्द साथ छोड़ देते हैं,

तुम मौन में भी संवाद रच जाते हो।


मेरे हर प्रश्न का उत्तर तुम,

मेरे हर श्वास का आधार तुम,

मैं जो भी हूँ,

उसका हर एक अंश तुम।


माधव,

यदि कभी मैं स्वयं को भूल जाऊँ,

तो मुझे फिर से मेरा परिचय देना,

यदि कभी मैं गिर जाऊँ,

तो बाँहों में भर फिर से खड़ा कर देना।


बस इतना कर देना प्रभु—

मेरे अंतर्मन में यूँ ही बसे रहना,

और जब अंतिम क्षण आए,

तो अपने चरणों में मुझे स्थान देना।


माधव…

मेरे कृष्ण…

सदैव मेरे संग रहना…

सदैव…

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